लक्ष्य और प्रारब्ध

लक्ष्य और प्रारब्ध.......
प्रत्येक व्यक्ति जीवन के साथ एक लक्ष्य लेकर आता है। प्रारब्ध के रूप में पिछले कर्मों के फल भी उसके साथ आते हैं। हर लक्ष्य की प्राप्ति में इच्छा-तप और श्रमरूपी साधना आवश्यक होती है। साधना के माध्यम से वह नारायण भी बन सकता है और उसके अभाव में वह अपने लक्ष्य से च्युत भी हो सकता है। कृष्ण ने इसलिए कहा कि ....
 'अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते।' 

यह अभ्यास हर युग में, हर मानव के लिए, हर कार्य में आवश्यक है। इसका कारण यह है कि हमारे जीवन का संचालन प्रकृति कर रही है। यह प्रकृति नित्य परिवर्तनशील है। अत: हमारे सभी क्रिया-कलाप, हाव-भाव निरन्तर बदलते रहते हैं। जीवन से हमारा परिचय शरीर के माध्यम से होता है। पंचभूतों से निर्मित हमारे शरीर के तीन धरातल हैं-स्थूल, सूक्ष्म और कारण। कारण शरीर आत्मा है, स्थूल शरीर उसकी अभिव्यक्ति है। सूक्ष्म शरीर इन दोनों के मध्य सेतु का कार्य करता है। अत: यही गति युक्त शरीर है जो प्राणमय कहा जाता है। शरीर को संचालित करने की समस्त शक्ति इसी में निहित रहती है।

शरीर भोजन से चलता है। भोजन से रस बनता है। रस से रक्त और फिर आगे के धातु अर्थात् मांस, मेद,मज्जा, अस्थि और शुक्र बनते हैं। शुक्र से ओज बनता है जो हमारे मन का पोषण करता है। पाचन कमजोर हो तो रस नहीं बनेगा। रस और रक्त न बने तो आगे के सभी धातु कमजोर पड़ जाते हैं। मन चूंकि अन्त में बनता है इसलिए हर धातु में विकार का असर मन पर भी पड़ता है। ओज यानी हमारा तेज भी प्रभावित होता है। यह ओज हमारा आभामण्डल यानी 'औरा' कहलाता है।

पाचन क्रिया से शरीर की सारी रासायनिक क्रियाएं जुड़ी हैं। ये रसायन हमारी अन्त:स्रावी ग्रन्थियों से निकलते हैं। अंग्रेजी में इन्हें 'एण्डोक्राइन ग्लैण्ड्स' कहते हैं। हमारी भाव क्रियाओं से इन पर प्रभाव पड़ता है। क्रोध होने पर हमारी भूख बन्द हो जाती है, रक्तचाप बढ़ जाता है। भय और प्रसन्नता आदि भावों से भी शरीर में होने वाले प्रभावों को महसूस कर सकते हैं। इन ग्रन्थियों का नियंत्रण मस्तिष्क से होता है। हम स्थूल ग्रन्थियों से निकलने वाले रसायनों को समझ सकते हैं। किन्तु मस्तिष्क से इन रसायनों के आदान-प्रदान को नहीं समझ पाते। मस्तिष्क का नियंत्रण विभिन्न ऊर्जाओं से होता है। ये ऊर्जाएं मन से, हमारे विचारों से प्राप्त होती हैं। मन के भावों से विचार बदलते हैं। मन पर इच्छा, स्मृति और कल्पनाओं का प्रभाव पड़ता है। यह हमारे विचारों को प्रभावित करता है। यह सब सूक्ष्म ऊर्जा का, सूक्ष्म शरीर का, प्राणों का कार्य क्षेत्र है। इसलिए कृष्ण ने भी मस्तिष्क को ही साधना का प्रधान अंग माना है।
     'सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
  मूध्न्र्याधायात्मन:प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥' 
                                         (गीता 8/12)

शरीर में प्राण- अपान समान-उदान-व्यान नाम के प्राण स्थूल प्राण हैं। किन्तु इनका निर्माण भी सूक्ष्म प्राणों से होता है। ये सूक्ष्म प्राण ही हमारे मस्तिष्क का संचालन करते हैं।
शरीर में कई अन्त:स्रावी ग्रन्थियां हैं। ये ग्रन्थियां ऊर्जा संचालन केन्द्र के रूप में हैं तो रसायन संचालन केन्द्र के रूप में भी हैं। ये ग्रन्थियां क्षेत्रीय केन्द्रों के रूप में कार्य करती हैं और सामूहिक रूप में भी। हम स्थूल शरीर और इन्द्रियों के माध्यम से जो कुछ अनुभव करते हैं वह सूक्ष्म में संचित होता है। हमारी भाव क्रियाओं का धरातल कारण शरीर है और वही हमारे स्थूल जीवन का मुख्य नियंत्रक है। 
शरीर विज्ञान में सात अन्त:स्रावी ग्रन्थियां मुख्य हैं। योग और तंत्र में सूक्ष्म धरातल पर विभिन्न 'चक्र' ऊर्जा केन्द्रों के रूप में दिखाई पड़ते हैं।
।।साभार।।

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