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Showing posts from November, 2025

सीताजी को किसके शाप के कारण श्रीराम का वियोग सहना पड़ा ?

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सीताजी को किसके शाप के कारण श्रीराम का वियोग सहना पड़ा ? प्राचीनकाल में मिथिला में सीरध्वज जनक नाम से प्रसिद्ध धर्मात्मा राजा राज्य करते थे । एक बार राजा जनक यज्ञ के लिए पृथ्वी जोत रहे थे । उस समय चौड़े मुंह वाली सीता (हल के धंसने से बनी गहरी रेखा) से एक कन्या का प्रादुर्भाव हुआ जो साक्षात् लक्ष्मी के समान रूपवती थी । सीता से ही प्रकट होने के कारण कन्या का नाम सीता रख दिया गया । राजा जनक की पुत्री होने के कारण वह जानकीकहलाने लगीं । दिनोंदिन सीताजी के शरीर, रूप, लावण्य और गुणों की वृद्धि शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भांति होने लगी । एक दिन सीताजी सखियों के साथ बगीचे में खेल रही थीं । वहां उन्हें एक पेड़ पर बड़े सुन्दर दो तोते बैठे दिखाई दिये । वे पक्षी आपस में एक कथा कह रहे थे— ‘इस पृथ्वी पर श्रीराम नाम से प्रसिद्ध एक बड़े सुन्दर राजा होंगे । उनकी महारानी का नाम सीता होगा । श्रीराम समस्त राजाओं को अपने अधीन करके सीता के साथ ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य करेंगे । धन्य है सीता और धन्य हैं श्रीराम ।’ तोते के मुंह से ऐसी बातें सुनकर सीता ने सोचा, ‘ये दोनों पक्षी मेरे ही जीवन की कथा क...

मृत्यु के साथ रिश्ते मिट जाते हैं

.     *🌳मृत्यु के साथ रिश्ते मिट जाते हैं🌳* *एक बार देवर्षि नारद अपने शिष्य तुम्बरू के साथ मृत्युलोक का भ्रमण कर रहे थे। गर्मियों के दिन थे। गर्मी की वजह से वह पीपल के पेड़ की छाया में जा बैठे। इतने में एक कसाई वहाँ से पच्चीस तीस बकरों को लेकर गुजरा।* *उसमें से एक बकरा एक दुकान पर चढ़कर मोठ खाने लपक पड़ा। उस दुकान पर नाम लिखा था - 'शगालचंद सेठ।' दुकानदार का बकरे पर ध्यान जाते ही उसने बकरे के कान पकड़कर दो-चार घूँसे मार दिये। बकरा 'मैंऽऽऽ.... मैैंऽऽऽ...' करने लगा और उसके मुँह में से सारे मोठ गिर गये।* *फिर कसाई को बकरा पकड़ाते हुए कहाः "जब इस बकरे को तू हलाल करेगा तो इसकी मुंडी मेरे को देना क्योंकि यह मेरे मोठ खा गया है।" देवर्षि नारद ने जरा-सा ध्यान लगाकर देखा और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे।* *तब तुम्बरू ने पूछाः "गुरुदेव! आप क्यों हँस रहे हैं? उस बकरे को जब घूँसे पड़ रहे थे तब तो आप दुःखी हो गये थे, किंतु ध्यान करने के बाद आप हँस पड़े। इस हँसी का क्या रहस्य है ?"* *नारद जी ने कहा :*   *"छोड़ो भी .. यह तो सब अपने अपने कर्मों का फल है, छोड़ो।"* *...