ऋषि अष्टावक्र
🌿 परिचय: ऋषि अष्टावक्र भारतीय सनातन परंपरा के महानतम ज्ञानी, वेदान्ती और आत्मज्ञानी महर्षि थे। उनके नाम का अर्थ है — “अष्टावक्र”, अर्थात् आठ स्थानों से वक्र (टेढ़े)। वे जन्म से ही आठ अंगों से टेढ़े थे, लेकिन उनकी बुद्धि और ज्ञान की गहराई ने समस्त ब्रह्मांड को चमत्कृत कर दिया। 📜 जन्म की कथा: अष्टावक्र के पिता थे कहोड ऋषि, और माता थीं सुवर्चला (महर्षि उड्डालक की पुत्री)। एक बार जब सुवर्चला गर्भवती थीं, तब कहोड ऋषि वेद पढ़ा रहे थे। कहीं पर उन्होंने वेद-पाठ में थोड़ा गलत उच्चारण किया। गर्भ में स्थित बालक (अष्टावक्र) ने यह सुन लिया और अपनी माता के माध्यम से कहा — “पिताजी, आप वेद का यह मंत्र गलत उच्चारण कर रहे हैं।” कहोड ऋषि यह सुनकर क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा — “अभी से पिता को उपदेश देता है! जा, तू आठ अंगों से वक्र होकर जन्म ले!” इसी शाप के कारण बालक आठ अंगों से टेढ़े होकर पैदा हुए और उनका नाम पड़ा — अष्टावक्र। 🧘♂️ राजा जनक और अष्टावक्र: जब अष्टावक्र बड़े हुए तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पिता कहोड ऋषि को राजा जनक के दरबार में एक शास्त्रार्थ में हार के कारण जल में डुबो दिया गया था। अष्टा...