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Showing posts from October, 2025

ऋषि अष्टावक्र

🌿 परिचय: ऋषि अष्टावक्र भारतीय सनातन परंपरा के महानतम ज्ञानी, वेदान्ती और आत्मज्ञानी महर्षि थे। उनके नाम का अर्थ है — “अष्टावक्र”, अर्थात् आठ स्थानों से वक्र (टेढ़े)। वे जन्म से ही आठ अंगों से टेढ़े थे, लेकिन उनकी बुद्धि और ज्ञान की गहराई ने समस्त ब्रह्मांड को चमत्कृत कर दिया। 📜 जन्म की कथा: अष्टावक्र के पिता थे कहोड ऋषि, और माता थीं सुवर्चला (महर्षि उड्डालक की पुत्री)। एक बार जब सुवर्चला गर्भवती थीं, तब कहोड ऋषि वेद पढ़ा रहे थे। कहीं पर उन्होंने वेद-पाठ में थोड़ा गलत उच्चारण किया। गर्भ में स्थित बालक (अष्टावक्र) ने यह सुन लिया और अपनी माता के माध्यम से कहा — “पिताजी, आप वेद का यह मंत्र गलत उच्चारण कर रहे हैं।” कहोड ऋषि यह सुनकर क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा — “अभी से पिता को उपदेश देता है! जा, तू आठ अंगों से वक्र होकर जन्म ले!” इसी शाप के कारण बालक आठ अंगों से टेढ़े होकर पैदा हुए और उनका नाम पड़ा — अष्टावक्र। 🧘‍♂️ राजा जनक और अष्टावक्र: जब अष्टावक्र बड़े हुए तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पिता कहोड ऋषि को राजा जनक के दरबार में एक शास्त्रार्थ में हार के कारण जल में डुबो दिया गया था। अष्टा...

पत्नी वामांगी क्यों कहलाती है ?

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*पत्नी वामांगी क्यों कहलाती है ?* *====================* शास्त्रों में पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है।  भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर शरीर।   हस्तरेखा विज्ञान की कुछ पुस्तकों में पुरुष के दाएं हाथ से पुरुष की और बाएं हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है। शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, द्विरागमन, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती। वामांगी होने के बावजूद भी कुछ कामों में स्त्री को दायीं ओर रहने के बात शास्त्र कहता है।  शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं ओर बैठना चाहिए। पत्नी के पति के दाएं या बाएं बैठने संबंधी इस मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति...

शकुनि कथा जन्म से लेकर मृत्यु तक

बहुत सुंदर और गहन प्रश्न। शकुनि (शकुनी मामा) महाभारत का एक अत्यंत रहस्यमय, बुद्धिमान, लेकिन साथ ही कूटनीति और छल का प्रतीक पात्र है। उसका जीवन केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं है — वह एक पूरे वंश के अपमान, प्रतिशोध, और धूर्त राजनीति का जीवंत प्रतीक है। नीचे मैं तुम्हें शकुनि की संपूर्ण कथा उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक कालानुक्रमिक क्रम में विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ — 🌿 १. शकुनि का जन्म और परिवार शकुनि का जन्म गंधार देश (वर्तमान अफगानिस्तान के कंधार क्षेत्र) में हुआ था। उसके पिता का नाम था — राजा सुबल (सुबलराज) और माता का नाम — सुबला रानी । शकुनि के कई भाई थे, और एक बहन थी — गान्धारी , जो बाद में हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र की पत्नी बनी। गंधार एक समृद्ध राज्य था, जहाँ कला, संस्कृति और ज्ञान का आदर होता था। शकुनि का बचपन विद्या, राजनीति, और शास्त्रों के अध्ययन में बीता। वह अत्यंत बुद्धिमान, तर्कशील और चालाक बालक था। उसे छोटी उम्र से ही कूटनीति (राजनीतिक बुद्धि) और रणनीति की शिक्षा दी गई थी। 👑 २. गंधारी और धृतराष्ट्र का विवाह – अपमान की जड़ जब गंधारी विवाह योग्य हुई, तो...

द्रोपदी की आधी साड़ी

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द्रोपदी यमुना स्नान के लिए गई । नहाते समय उसकी दृष्टि कुछ दूर स्नान करते एक साधु पर पड़ी। उनके शरीर पर केवल एक लंगोटी मात्र थी।दूसरी लंगोटी बदलने के लिए किनारे पर रखी थी। पर हवा का झोंका आया और वह दूसरी लंगोटी उड़कर पानी में बह गई। दुर्भाग्य से भीगी हुई लंगोटी भी पुराने होने के कारण उसी समय फट गई । तन ढकने में भी अड़चन खड़ी हो गई । प्रकाश फैलने लगा था। स्नान करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। साधु का असमंजस बढ़ा। वह निर्लज्ज बनकर कैसे खड़ा रहे? उसने कुछ दूर पर उगी एक छोटी सी झाड़ी के नीचे अपने को छिपा लिया। जब रात हो जाए तब अंधेरे में अपने स्थान पर जाने का उसका इरादा था। द्रोपदी ने यह सारा दृश्य देखा और साधु की कठिनाई को समझा। उसने सहायता करने की बात सोची। उसके पास दूसरी धोती न थी। सो, आधी फाड़ कर अपना शरीर किसी प्रकार ढक लिया और से आधी को लेकर उस झाड़ी के समीप पहुंची जहां निर्वस्त्र साधु छिपा हुआ था। द्रोपदी बोली- पिताजी! आपकी कठिनाई को मैंने समझा है। अपनी आधी साड़ी फाड़ कर लाई हूं। इससे आप अपना तन ढकें और घर चले जाएं। आधी से मेरा भी काम चल गया है। साधु की आंखों में आंसू आ गए। उसने क...

पितामह भीष्म ने अपनी शस्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए सोने के पांच अचूक

पितामह भीष्म ने अपनी शस्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए सोने के पांच अचूक तीर निकाले और इसे अभिमंत्रित करके बोले- “दुर्योधन! तुम व्यर्थ में संदेह करते हो। इन बाणों से कोई नहीं बच सकता। कल का दिन युद्ध का अंतिम दिन होगा। एक ही दिन में पांचों पांडवों को इन बाणों से समाप्त कर दूंगा। फिर पांडवों के मरते हुए युद्ध का परिणाम तुम्हारे पक्ष में होगा।” पितामह भीष्म की बात सुनकर दुर्योधन प्रसन्न हुआ लेकिन अगले ही क्षण उसके मन में पितामह भीष्म के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया। कपटी दुर्योधन भीष्म की बातों को सुनकर प्रसन्न तो हुआ। परंतु, अब दुर्योधन को भीष्म की बातों में भी छल-कपट दिखने लगे। दुर्योधन ने भीष्म से कहा- “पितामह! आपकी योजना बहुत अच्छी है। किन्तु, मुझे फिर भी संदेह हो रहा है कि आप इतनी जल्दी और आसानी से पांडवों को मारेंगे। हो सकता है आप मोहवश या प्रेमवश उन्हें ना मार पाएं। अतः आप इन बाणों को मुझे दे दें। मैं युद्ध भूमि में आपको ये पाँचों बाण दूंगा और आपको आपके कर्तव्य की याद दिलाऊंगा। तब आप पांडवों का वध मेरे सामने कीजियेगा।” दुर्योधन की बात सुनकर पितामह भीष्म ने पांचों अभिमंत्रित बाण दुर्य...