भाव की रसोई में बना प्रसाद ही भगवान स्वीकार करते हैं।
🌺 भाव की रसोई: जहाँ शून्यता में पूर्णता पकती है 🌺 मोक्षदायिनी काशी—जहाँ हर श्वास में मंत्र है और हर पत्थर में कथा। उसी काशी की एक तंग, लगभग भुला दी गई गली में, एक पुरानी-सी झोपड़ी थी। मिट्टी की दीवारें, टूटी खपरैल, और बरसात में रिसता हुआ छप्पर। यही संसार था गोमती माँ का। गोमती माँ की उम्र अस्सी से ऊपर थी। कमर झुकी, आँखों में धुंध, और हाथों में समय की दरारें। देह पर एक पुरानी श्वेत साड़ी—इतनी बार सिली कि पैबंदों की गिनती भूल चुकी थी। संसार में उनका कोई नहीं था। न पति, न पुत्र, न धन। यदि कुछ था, तो झोपड़ी के कोने में रखा एक छोटा-सा काले पत्थर का बाल-गोपाल। ⸻ 🌿 निर्धनता, पर नियम अटूट गाँव जानता था—गोमती माँ के घर कई-कई दिन चूल्हा नहीं जलता। पर एक नियम कभी नहीं टूटा। हर दिन, ठीक दोपहर को, जब सूर्य सिर पर आ जाता, गोमती माँ अपनी “रसोई” शुरू करती थीं। यह रसोई आँखों से नहीं, हृदय से चलती थी। घर में— • न आटा था • न घी • न शक्कर • न ईंधन फिर भी, वे चूल्हे में सूखी पत्तियाँ सुलगातीं, उस पर रखतीं एक टूटी कड़ाही, और आँखें मूँद लेतीं। यहीं से शुरू होती थी मानस पूजा। ⸻ 🍯 शू...