कुरुक्षेत्र का एक अनदेखा सत्य
😈अहंकार की राख: कुरुक्षेत्र का एक अनदेखा सत्य 🌄
कुरुक्षेत्र की रणभूमि महाविनाश की साक्षी बन रही थी। आकाश में धूल के गुबार थे और दिशाएं शंखनाद और टंकार से गूंज रही थीं। यह वह समय था जब दो महारथी आमने-सामने थे—एक तरफ गांडीवधारी अर्जुन और दूसरी तरफ सूर्यपुत्र कर्ण। यह केवल बाणों का युद्ध नहीं, बल्कि कौशल और अहंकार का भी टकराव था।
रणभूमि का दृश्य:
अर्जुन के रथ की बागडोर स्वयं त्रिभुवन के स्वामी, श्रीकृष्ण के हाथों में थी। अर्जुन अपने गांडीव से प्राणघातक बाण छोड़ते, और उनका निशाना इतना अचूक होता कि बाण लगते ही कर्ण का विशाल रथ कई गज पीछे घिसटता हुआ दूर चला जाता। अर्जुन के चेहरे पर विजय की मुस्कान तैर जाती। उन्हें लगता कि उनका पराक्रम कर्ण से कहीं श्रेष्ठ है।
इसके विपरीत, जब कर्ण अपनी पूरी शक्ति लगाकर प्रत्यंचा खींचते और बाण छोड़ते, तो अर्जुन का रथ केवल सात कदम पीछे हहटता।
लेकिन, यहाँ एक विचित्र घटना घट रही थी।
हर बार जब कर्ण का बाण लगता और रथ मात्र कुछ कदम हिलता, तो वासुदेव श्रीकृष्ण के मुख से अनायास ही निकल पड़ता— "अद्भुत! क्या वीर है यह कर्ण! महान है इसकी भुजाओं का बल!"
अर्जुन का क्षोभ और प्रश्न:
अर्जुन से यह सहा नहीं गया। अपने ही सारथी द्वारा शत्रु की प्रशंसा सुनकर उनका अहंकार तिलमिला उठा। दिन भर यही क्रम चलता रहा। अंततः, अर्जुन के धैर्य का बांध टूट गया। उन्होंने बाण नीचे किए और व्यथित स्वर में पूछा:
> "हे केशव! यह कैसा न्याय है? मैं कर्ण के रथ को मीलों दूर फेंक देता हूँ, तब आप मौन रहते हैं। और यह सूतपुत्र मेरे रथ को मात्र सात कदम पीछे धकेलता है, तो आप उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते? मेरे पुरुषार्थ का ऐसा अपमान क्यों?"
श्रीकृष्ण का रहस्योद्घाटन:
श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। उनकी आँखों में वह गंभीरता थी जो ब्रह्मांड के सत्य को समेटे हुए थी। वे बोले:
"पार्थ! तुम जो देख रहे हो, वह सत्य नहीं है। तुम अपनी शक्ति के मद में यह भूल गए हो कि तुम्हारे रथ पर कौन विराजमान है। जरा ऊपर देखो... तुम्हारे रथ की ध्वजा पर साक्षात महावीर हनुमान विराजमान हैं, जिनके हुंकार मात्र से पर्वत डोल जाते हैं। और सारथी के रूप में स्वयं मैं, त्रिलोकीनाथ वासुदेव, यहाँ बैठा हूँ, जिसके रोम-रोम में अनंत ब्रह्मांड का भार है।"
श्रीकृष्ण ने अर्जुन की आँखों में झांकते हुए कहा:
"अर्जुन! जिस रथ पर स्वयं शेषनाग, हनुमान और नारायण का भार हो, उसे हिलाना तो दूर, स्पर्श करना भी असंभव है। यदि हम न होते, तो कर्ण का पहला बाण ही तुम्हारे रथ को धूल में मिला चुका होता। ऐसे भारी रथ को सात कदम पीछे धकेल देना कर्ण के अतुलनीय बाहुबल का प्रमाण है।"
अर्जुन यह सुनकर स्तब्ध रह गए। उनके पौरुष का अभिमान क्षण भर में लज्जा में बदल गया।
युद्ध समाप्ति और रथ का रहस्य:
महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। पांडवों की विजय हुई। प्रतिदिन की दिनचर्या यह थी कि युद्ध से लौटने पर श्रीकृष्ण पहले उतरते थे, और फिर अर्जुन को उतारते थे। परंतु, अंतिम दिन दृश्य बदल गया।
रथ छावनी में रुका। वातावरण में एक अजीब सी शांति थी। श्रीकृष्ण गंभीर स्वर में बोले:
"अर्जुन! आज तुम पहले उतरो। अपने गांडीव और तरकश को लेकर रथ से दूर चले जाओ।"
अर्जुन को यह आदेश विचित्र लगा, किंतु वे बिना प्रश्न किए उतर गए और कुछ दूर जाकर खड़े हो गए। इसके पश्चात, भगवान श्रीकृष्ण ने रथ से अपने चरण नीचे रखे।
वह विस्फोट जिसने आँखें खोल दीं:
जैसे ही श्रीकृष्ण के चरण भूमि पर पड़े और हनुमान जी ध्वजा से अंतर्धान हुए, एक भयंकर विस्फोट हुआ!
देखते ही देखते, वह दिव्य रथ धू-धू कर जल उठा। गगनभेदी लपटों ने उसे घेर लिया और पल भर में वह भव्य रथ राख के ढेर में बदल गया।
अर्जुन भयभीत और आश्चर्यचकित होकर दौड़ते हुए आए— "केशव! यह क्या चमत्कार है? मेरा रथ भस्म कैसे हो गया?"
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा और जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझाया:
"पार्थ! यह रथ तो कब का भस्म हो चुका था। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और कर्ण के ब्रह्मास्त्रों और दिव्यास्त्रों ने इसे युद्ध के बीच ही जला दिया था। यह तो केवल मेरा 'संकल्प' था जिसने इसे अब तक एक आकार में बांधे रखा था। तुम जिसे अपनी विजय समझ रहे थे, वह ईश्वरीय कृपा मात्र थी।"
उस दिन अर्जुन का बचा-खुचा अहंकार भी उस रथ की राख के साथ उड़ गया। वे समझ गए कि मनुष्य केवल एक माध्यम (निमित्त) है। जो कुछ भी घटित होता है, वह उस परम शक्ति की इच्छा से है।
अर्जुन ने अपने घुटने टेके और अश्रुपूरित नेत्रों से वासुदेव को नमन किया। उन्हें गीता के उपदेश का सार अब समझ आया था— "कर्म कर, फल की चिंता मत कर, और कर्तापन का अभिमान त्याग दे।"
हमारे भीतर का अर्जुन भी अक्सर अपनी सफलताओं को अपना ही पराक्रम मान बैठता है। हम भूल जाते हैं कि हमारी सफलता के रथ पर अदृश्य रूप से माता-पिता का आशीर्वाद, गुरु का ज्ञान और ईश्वर की कृपा विराजमान है। जिस दिन यह 'अदृश्य शक्ति' साथ छोड़ देती है, हमारा अहंकार रूपी रथ भस्म होने में देर नहीं लगती।
🙏🏻 जय श्री कृष्णा। ❤️
Comments
Post a Comment