विराट पुरुष का जागरण

⚡सांख्य योग: विराट पुरुष का जागरण और परमात्मा की प्रधानता💥

एक समय की बात है, ज्ञान और वैराग्य के मूर्तिमान स्वरूप भगवान कपिल अपनी माता देवहूति को सृष्टि के सबसे गूढ़ रहस्यों से अवगत करा रहे थे। वातावरण में एक दिव्य शांति थी, और भगवान कपिल की वाणी से ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही थी।
भगवान कपिल ने कहा— "हे माता! अब मैं तुम्हें उस 'विराट पुरुष' (ब्रह्मांडीय शरीर) के अंगों और उनके अधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति की अद्भुत कथा सुनाता हूँ। ध्यान से सुनो कि कैसे जड़ और चेतन का मिलन हुआ।"

१. विराट देह और देवताओं का प्राकट्य

जब वह आदि विराट पुरुष हिरण्यमय अंड से प्रकट हुआ, तो उसके अंगों का विभाजन आरंभ हुआ। यह प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित और दैवीय थी:
 
* त्वचा और वनस्पति: सबसे पहले उस विराट शरीर में 'त्वचा' प्रकट हुई। उस त्वचा से रोएं (शरीर के बाल) और केश उत्पन्न हुए। जैसे ही ये रोम प्रकट हुए, उनके अधिष्ठाता देवता के रूप में 'औषधियाँ और वनस्पतियाँ' (अन्न, फल-फूल) प्रकट हो गईं, मानो धरती पर हरियाली छा गई हो।
 
* प्रजनन और जल: इसके बाद 'लिंग' (जनन इंद्रिय) का प्रादुर्भाव हुआ। उससे सृजन की शक्ति यानी 'वीर्य' बना। वीर्य के प्रकट होते ही उसके स्वामी 'जल देवता' (आपोदेव) उत्पन्न हुए, क्योंकि जीवन जल के बिना संभव नहीं।
 
* गुदा और मृत्यु: फिर शरीर से मल त्याग के लिए 'गुदा' प्रकट हुई। वहाँ से अपानवायु निकली और उस मार्ग के देवता के रूप में 'मृत्यु' का जन्म हुआ, जो समस्त लोकों में भय का संचार करती है।

 * हाथ और इंद्र: तत्पश्चात उस विराट पुरुष के 'हाथ' बाहर आए, जिनसे बल और पौरुष का जन्म हुआ। उन हाथों की शक्ति को संभालने के लिए देवताओं के राजा 'इन्द्र' प्रकट हुए।
 
* चरण और विष्णु: जब उस विराट पुरुष के 'चरण' (पैर) बने, तो उनमें चलने की शक्ति (गति) आई। उस गति का संचालन करने के लिए स्वयं पालनहार 'भगवान विष्णु' प्रकट हुए।
 
* नाड़ियाँ और नदियाँ: विराट पुरुष के शरीर में जब 'नाड़ियाँ' (Veins) बनीं, तो उनमें रक्त प्रवाहित होने लगा। इसी रक्त के प्रवाह से संसार में 'नदियों' की उत्पत्ति हुई।

 * उदर और समुद्र: फिर 'उदर' (पेट) का निर्माण हुआ, जिससे भूख और प्यास जैसी अनुभूतियाँ जन्मीं। इस असीम भूख और प्यास को धारण करने के लिए विशाल 'समुद्र' देवता बनकर वहाँ स्थित हुए।

 * हृदय और अंतःकरण: अंत में सबसे महत्वपूर्ण अंग, 'हृदय' का निर्माण हुआ। हृदय से मन निकला, जिसके देवता 'चंद्रमा' हुए। मन के बाद बुद्धि आई, जिसके देवता 'ब्रह्मा' (वाणी/ज्ञान) बने। फिर अहंकार का जन्म हुआ, जिसे 'रुद्र' (भगवान शिव) ने स्वीकार किया। और अंत में चित्त (चेतना) प्रकट हुआ, जिसका स्वामी स्वयं 'क्षेत्रज्ञ' (परमात्मा/जीव) बना।

२. देवताओं की विवशता: शक्ति होने पर भी शव समान

सृष्टि के सभी उपकरण तैयार थे। अग्नि, वायु, सूर्य, इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र जैसे महान देवता अपने-अपने स्थान और शक्तियों के साथ प्रकट हो चुके थे।

परंतु, एक विस्मयकारी घटना घटी!

ये सभी देवता उस विराट पुरुष को जगाने का प्रयास करने लगे, ताकि सृष्टि का कार्य आगे बढ़े। वे उसे उठाना चाहते थे, जीवित करना चाहते थे। लेकिन, आश्चर्य! इतने शक्तिशाली देवताओं के होते हुए भी वह विराट पुरुष अचेत, निस्पंद और शांत पड़ा रहा। वह जल के ऊपर लेटा रहा, मानो कोई शव हो।

जब सामूहिक प्रयास विफल हो गया, तो देवताओं ने सोचा कि शायद अंगों में प्रवेश करने से यह जाग उठेगा। वे एक-एक करके अपनी पूरी शक्ति के साथ विराट पुरुष के शरीर में प्रवेश करने लगे:

 * 🔥 अग्नि ने वाणी की शक्ति के साथ मुख में प्रवेश किया, पर विराट पुरुष नहीं बोला।

 * 🌬️ वायु ने प्राणशक्ति बनकर नासिका में प्रवेश किया, पर साँस नहीं चली।

 * ☀️ सूर्य ने नेत्रों में प्रवेश किया, पर उन आँखों में कोई दृष्टि नहीं आई।

 * 👂 दिक्पालों (दिशाओं) ने कानों में प्रवेश किया, पर उसे कुछ सुनाई नहीं दिया।

 * 🌿 वनस्पतियों ने त्वचा में प्रवेश किया, पर स्पर्श का अनुभव नहीं हुआ।

 * 💧 जल ने वीर्य बनकर लिंग में प्रवेश किया, पर सृजन शक्ति नहीं जागी।

 * 💀 मृत्यु ने गुदा में प्रवेश किया, पर अपान वायु सक्रिय नहीं हुई।

 * ⚡ इन्द्र ने हाथों में बल बनकर और विष्णु ने पैरों में गति बनकर प्रवेश किया, पर न हाथ उठे, न पैर हिले।

 * 🌊 समुद्र ने पेट में भूख बनकर प्रवेश किया, चंद्रमा ने मन बनकर 
और ब्रह्मा ने बुद्धि बनकर हृदय में आसन जमाया। यहाँ तक कि भगवान रुद्र ने भी अहंकार के रूप में प्रवेश किया।
परिणाम?

शून्य। सब व्यर्थ। वह विराट शरीर टस-से-मस नहीं हुआ। सारे देवता हताश हो गए कि आखिर कमी कहाँ रह गई है?

३. परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) का स्पर्श और जागरण

जब सारे उपाय विफल हो गए, तब अंत में 'चित्त' के अधिष्ठाता देवता, जो स्वयं 'क्षेत्रज्ञ' (परमात्मा/जीवात्मा) हैं, उन्होंने उस विराट पुरुष के हृदय में प्रवेश किया।

 जैसे ही क्षेत्रज्ञ ने चित्त के साथ हृदय में प्रवेश किया, वह विराट पुरुष तत्काल जल के ऊपर उठकर खड़ा हो गया। उसमें चेतना दौड़ गई, नेत्र खुल गए, और ब्रह्मांड में जीवन का स्पंदन शुरू हो गया।

४. भगवान कपिल का दिव्य उपदेश

इस घटना का मर्म समझाते हुए भगवान कपिल अपनी माता से कहते हैं:

"हे माता! इस कथा में ही जीवन का परम सत्य छिपा है। जैसे कोई मनुष्य गहरी नींद में सोया हो, तो न तो उसके प्राण, न उसकी इंद्रियाँ, न उसका चंचल मन और न ही उसकी तीक्ष्ण बुद्धि उसे स्वयं जगा सकती है। ये सब जड़ हैं। जब तक शरीर के भीतर बैठा हुआ 'आत्मा' (क्षेत्रज्ञ) सक्रिय नहीं होता, तब तक ये सभी शक्तियाँ शव के समान हैं।"

"इसलिए, हे माता! ज्ञानी मनुष्य को यह समझना चाहिए कि इन्द्रियाँ, मन और देवता केवल उपकरण हैं, कर्ता नहीं। असली शक्ति, असली सत्ता उस परम-तत्व (परमात्मा) की है जो भीतर बैठकर सब कुछ प्रकाशित कर रहा है।

अतः मनुष्य को चाहिए कि वह भक्ति, वैराग्य और एकाग्रता के माध्यम से उस 'अंतर्यामी परमात्मा' को पहचाने और निरंतर उसी का चिंतन करे। क्योंकि उसके बिना यह देह, यह संसार और यह जीवन—सब कुछ शून्य है।"

!! जय श्री कृष्णा !!

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