एक भक्त जो ठाकुर जी को डंडा दिखाकर डराता था
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📙✨एक भक्त जो ठाकुर जी को डंडा दिखाकर डराता था✨📙
ये कथा है एक ऐसे अनोखे प्रेमी भक्त की,
जिसकी भक्ति में ममता भी थी, झुंझलाहट भी,
शरारत भी थी, और अपनापन भी…
उसका नाम था — बाबूलाल।
गाँव का एक बूढ़ा बाबा, जो फटे कुर्ते में घूमता, और लाठी के सहारे चलता था।
लेकिन उसका सबसे प्रिय काम था —
हर सुबह मंदिर जाकर ठाकुर जी को डाँटना!
सुबह-सुबह मंदिर खुलता नहीं कि बाबूलाल मंदिर की चौखट पर पहुँच जाता,
लाठी टिकाकर दरवाज़ा खटखटाता और जोर से बोलता —
"खोलो रे ठाकुर! आज फिर गाय भाग गई है… और वो भी तुम्हारे खेत में गई थी!
तेरा नाम गोपाल है, और काम कुछ नहीं करता!"
पंडितजी मुस्कराते, गाँववाले हँसते, पर ठाकुर जी… बस मुस्करा देते।
एक दिन बाबूलाल नाराज़ होकर सीधा गर्भगृह में पहुँचा।
लाठी उठाई और बोला —
"अब बताता हूँ तुझे! रोज़ माखन माँगता है, पर मेरी छत टपक रही है —
भोग के लिए काजू-किशमिश चाहिए,
पर मेरा बुढ़ापा अकेले कट रहा है —
क्यों न दूँ तुझे एक लाठी की टिक्की?"
और फिर क्या!
डंडा उठाया और धीरे से मूर्ति के सामने ज़मीन पर पटका।
“आज बस! नहीं आया तो तेरे सिर पर पटक दूँगा ये!”
तभी…
ठाकुर जी के चरणों से एक छोटी सी मिश्री की डली गिर पड़ी।
और साथ में पान के पत्ते में लिपटा एक चिट्ठी जैसा कुछ।
बाबूलाल काँप गया…
चिट्ठी खोली तो उसमें लिखा था:
"बाबा!
तेरा डंडा नहीं डराता —
तेरे डंडे में जो ममता है, वही मुझे खींच लाती है।
तेरा गुस्सा नहीं डराता —
तेरे गुस्से में छिपा अपनापन मुझे प्यारा है।
तू डाँटता है, क्योंकि तू मुझे अपना मानता है।
बस यूँ ही अपना रहना… मैं तुझसे भाग नहीं सकता।"
– तेरा नटखट गोपाल
बाबूलाल रो पड़ा।
उस दिन पहली बार उसने डंडा नहीं उठाया,
बल्कि उसे मूर्ति के पास रख दिया और बोला —
"अब ये तुझ पर नहीं, तेरे लिए है बेटा…
जब थक जाए, सहारा ले लेना।"
गाँव में अब भी लोग मंदिर जाते हैं —
पर कहते हैं,
"जब कोई प्रेम से डाँटे, और भगवान मुस्करा दे — तो समझ लो, वो सच्चा भक्त है।"
✨ठाकुर जी को सबसे प्रिय वो डाँट होती है, जिसमें माँ की झिड़की और प्रेम की छाया हो।✨
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