केदारनाथ का आधा भाग है 'पशुपतिनाथ' ज्योतिर्लिंग
केदारनाथ का आधा भाग है 'पशुपतिनाथ' ज्योतिर्लिंग
श्रावण माह में श्रद्धालुजन अपनी-अपनी क्षमतानुसार भारत के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन व पूजा-अर्चना करने का प्रयास करते हैं। संपूर्ण श्रावण मास में शिव मंदिर में मेला सा लगा रहता है। सोमवार के दिन तो पूजन के लिए मारामारी सी रहती है। पूरे श्रावण भर दर्शन और पूजन के लिए यहां भी शिव भक्तों का तांता लगा रहता है।
भगवान शिव का एक महत्वपूर्ण स्थल पशुपति नाथ मंदिर है, जो नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बागमती नदी के किनारे देवपाटन नामक गांव में स्थित एक हिंदू मंदिर है।
मुख्य रूप से पशुपतिनाथ में आस्था रखने वालों हिंदुओं को ही मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति है। गैर हिंदू आगंतुकों को इसे बाहर से बागमती नदी के दूसरे किनारे से ही इसे देखने की अनुमति है।
नेपाल के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने से पहले यह मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ का मुख्य निवास माना जाता था। यह शिव मंदिर नेपाल का सबसे पवित्र शिव मंदिर माना जाता है। पशुपतिनाथ मंदिर में शिवरात्रि का पर्व विशेष महत्व के साथ मनाया जाता है।
पगोंडा शैली में बने पशुपतिनाथ मंदिर को 1979 में यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की में सूची में भी सूचीबद्ध किया गया था।
भारत के बड़े-बड़े मंदिरों में दर्शन, पूजा-पाठ आदि के लिए जिस प्रकार से नियमों में बदलाव कर दिए गए हैं, ठीक उसी प्रकार ही पशुपति नाथ मंदिर में दर्शन आदि के नियमों में बदलाव हुआ है।
पहले की तरह बेधड़क जाकर भोलेनाथ के इस रूप का दर्शन अब नहीं किए जा सकते। मंदिर में दर्शन का समय तथा पूजा-पाठ के तौर-तरीके सब बदले हुए हैं। पूजा-अर्चना के विधि-विधान और पूजा सामग्री के चढ़ावे में आपको मंदिर के नियम का पालन करना होगा। सब कुछ समयबद्ध और चरणबद्ध तरीके से तय कर दिया गया है।
मंदिर प्रशासन ने पहले के विपरीत पूजा या रुद्राभिषेक या और कोई पूजा कराने के लिए पुजारियों की दक्षिणा को तय कर बड़े से बोर्ड पर डिसप्ले कर दिया है। विशेष पूजा के लिए अलग से एक प्रकोष्ठ बनाया गया है, जिसके माध्यम से आप मंदिर में अपनी मनचाही पूजा करा पाएंगे।
पूजा की फीस को जमा करके आपको आपकी पूजा संबंधित रसीद दे दी जाएगी। उसके अनुसार ही आप दर्शन, पूजा-पाठ आदि कर सकेंगे। इसकी फीस सौ रुपए से लेकर हजारों तक में है।
मान्यता है कि यहां आदि काल से ही शिव जी की मौजूदगी है। पशुपतिनाथ को 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ का आधा भाग माना जाता है। यह मंदिर काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के समीप स्थित है। इस नदी को भारत की गंगा की तरह मोक्षदायिनी कहा जाता है। मंदिर के पश्चिमी और दक्षिणी छोर पर बनारस के मणिकर्णिका घाट की तरह हिंदुओं के शवों का अंतिम संस्कार होता देखा जा सकता है। मणिकर्णिका घाट की तरह यहां भी चिताओं का जलना अनवरत जारी रहता है।
इस मंदिर में दैनिक पूजा अर्चना के लिए पांच पुजारियों का चयन किया जाता है। 15 वीं शताब्दी के राजा प्रताप मल्ल द्वारा शुरु हुई परंपरा के अनुसार मंदिर में पांच में से चार पुजारी (भट्ट) और एक मुख्य पुजारी मूल-भट्ट (दक्षिण भारत के) ब्राह्मणों में से रखे जाते हैं।
मंदिर हिन्दू धर्म के 8 सबसे पवित्र स्थलों में से एक है।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव एक बार वाराणसी के देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे मृगस्थली चले आए। यह जगह बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में थी। यहां भोलेनाथ चिंकारे का रूप धारण कर योग निद्रा में लीन हो गए। इधर, उनको खोजते खोजते देवता जब वहां पहुंचे तो देवताओं ने उन्हें वाराणसी ले जाने का का बहुत प्रयास किया। जब देवगण उनसे वाराणसी चलने के लिए ज्यादा आग्रह करने लगे तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर जाने के लिए छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकड़ों में टूट गया, इसके बाद भगवान पशुपति चतुर्मुखलिंग के रूप में प्रकट हुए।
पशुपतिनाथ लिंग विग्रह में इनके चार दिशाओं में चारमुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है। अतः इस मंदिर में भगवान शिव की पांच मुख वाली मूर्ति है। विग्रह के प्रत्येक मुखाकार के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है।
हम आपको अवगत कराना चाहेंगे कि इस विग्रह के सभी मुख अलग-अलग महत्व के हैं और इन्हीं पांच मुखाकृतियों की पूजा का अलग-अलग महत्व है। शायद उसी हिसाब से उसके शुल्क तय किए गए हैं।
दक्षिण दिशा की ओर वाला पहला मुख 'अघोर' मुख कहलाता है। पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को 'तत्पुरुष', उत्तर दिशा की ओर वाले मुख को 'अर्धनारीश्वर' रूप तथा पश्चिमी दिशा की ओर वाले मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है।
इस विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुंह और एक मुंह ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। पूर्व दिशा के मुख को तत्पुरुष, पश्चिम के मुंह को सद्ज्योत, उत्तर के मुंह को वामदेव या अर्धनारीश्वर, दक्षिण के मुंह को अघोरा कहते हैं। ऊपर के मुंह को ईशान मुंह कहते हैं।
ऊपरी भाग अर्थात ऊपर की ओर वाले मुख को 'ईशान' के नाम से जाना जाता है। यह निराकार मुख है। इसी निराकार मुख को भगवान पशुपतिनाथ का श्रेष्ठतम मुख माना जाता है।
नेपाल के राजाओं ने 1747 से ही पशुपतिनाथ मंदिर में भगवान की सेवा के लिए भारतीय ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था।
सर्वप्रथम दक्षिण भारतीय ब्राह्मण को 'पशुपतिनाथ मंदिर' का प्रधान पुरोहित नियुक्त किया गया था। दक्षिण भारतीय भट्ट ब्राह्मण ही इस मंदिर के प्रधान पुजारी नियुक्त होते रहे हैं, यह परम्परा आज भी कायम है।
मान्यता है कि भोलेनाथ के देह स्थल केदारनाथ और मुख स्थल पशुपतिनाथ के दर्शन के बाद ही सभी बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का पुण्य प्राप्त होता है। पशुपतिनाथ में भैंस के सिर और केदारनाथ में भैंस की पीठ के रूप में शिवलिंग की पूजा होती है।
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नेपाल में प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष ने तीसरी सदी ईसा पूर्व में कराया था किंतु इस मंदिर से संबंधित गाड़ीउपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ 13वीं शताब्दी के ही हैं। यह मूल मंदिर कई बार नष्ट हुआ। इस मंदिर को वर्तमान स्वरूप तत्कालीन नेपाल नरेश भूपतेंद्र मल्ल ने 1697 में प्रदान किया।
नेपाल महात्म्य और हिमवतखंड पर आधारित स्थानीय किंवदंती के अनुसार एक बार भगवान शिव वाराणसी के अन्य देवताओं को छोड़कर बागमती नदी के किनारे स्थित मृगस्थली चले गए, जो बागमती नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में है। भगवान शिव वहां पर एक चिंकारे का रूप धारण कर योग निद्रा में लीन हो गए। इधर, उनको खोजते खोजते देवता वहां पहुंचे और उनसे वाराणसी चलने के लिए आग्रह करने लगे तो उन्होंने नदी के दूसरे किनारे पर जाने के लिए छलांग लगा दी। इस दौरान उनका सींग चार टुकडों में टूट गया। इस घटना के बाद भगवान पशुपति चतुर्मुख लिंग के रूप में प्रकट हुए।
इस मंदिर की कई नकलों का भी निर्माण हुआ है जिनमें भक्तपुर (1480), ललितपुर (1566) और बनारस (19वीं शताब्दी के प्रारंभ में) शामिल हैं।
पशुपतिनाथ के बगैर अधूरा है भारत का यह ज्योतिर्लिंग
ऐसी मान्यता प्रचलित है कि केदारनाथ शिवलिंग, पशुपतिनाथ का आधा भाग है। इसलिए केदारनाथ ज्योतिर्लिंग को पशुपतिनाथ के बगैर अधूरा माना जाता है। केदारनाथ शिवलिंग, भारत के उत्तराखण्ड राज्य में स्थित है ।
अतः प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर के बारे में प्रचलित किंवदंती के अनुसार पाण्डवों को स्वर्गप्रयाण के समय भैंसे के स्वरूप में शिव के दर्शन हुए थे। जब भगवानशिव पैसे के रूप में धरती में समाने लगे तो भीम ने उनकी पूँछ पकड़ ली। ऐसे में उनका कूबड रुपी शरीर तो उस स्थान पर स्थापित हो गया जो बाद में केदारनाथ कहलाया तथा जहाँ पर उनका मुख प्रकट धरती से बाहर हुआ, वह स्थान पशुपतिनाथ कहलाया।
यहां दर्शन से नहीं मिलती पशु योनि
यहां शिवलिंग के दर्शन के पहले नंदी के दर्शन नहीं किए जाते क्योंकि मान्यता है कि इस मंदिर में शिवलिंग के दर्शन के पहले नंदी का दर्शन न किया जायें तो इस दर्शन से व्यक्ति को मृत्यु के बाद पशु योनि प्राप्त नहीं होती। यदि कोई ऐसा करता है तो उसे अगले जन्म में पशु बनना पड़ता है।
यहां कि एक और मान्यता है कि इस मंदिर में यदि कोई व्यक्ति आधा घंटा पूरा मन लगाकर ध्यान करे तो वह व्यक्ति कई प्रकार की समस्याओं से मुक्त हो जाता है।
पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतर्ध्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।
ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।
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